Friday, July 14, 2017

भारत-चीन में जारी तनातनी से देशवासियों में आक्रोश

 पिछले कई दिनों से भारत-चीन के बीच बार्डर पर दोनों देशों की सेना के बीच तनातनी जारी है। अब यह सिर्फ मसला सीमा तक नहीं रह गया है। चीन की गीदड़ धमकी से देश की जनता में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। देश के प्रति अपनी देशभक्ति प्रकट करते हुए मुंबई के कुछ स्कूलों ने मेड इन चायना सामानों का बहिष्कार किया है। प्रधानाध्यपकों ने विद्याथियों सेपढ़ाई में चीनी सामग्री को न इस्तेमाल करने का आह्वान किया है। इसके साथ ही भाई-बहन के पवित्र त्यौहार रक्षाबंधन पर सैनिक भाइयों को सबसा बड़ा उपहार चाइना राखी न खरीदकर देंगी।

चायनीज राखी पर असर

     7 अगस्त को रक्षाबंधन है। इस दौरान सबसे ज्यादा चीन निर्मित राखी की खरीदारी होती थी। इस बार भारत-चीन में बढ़ते तनाव के कारण बाजारों में चायनीज राखी न के बराबर दिख रही हंै। एक राखी दुकानदार ने बताया कि चीनी वस्तुओं के विरोध चलते इस बार विदेशी राखियों की डिमांड कम रहेगी।  इसका सीधा असर चीनी कंपनियों पर पड़ेगा। उन्होंने बताया कि दुकानदार भी इसे बेचने से बच रहे हैं। देश की महिलाओं व बहनों से अपील की गई है कि वे देश में बनी राखियों को ही अपने भाई की कलाइयों पर बांधे।

1500 स्कूल अभियान में शामिल

1500 से ज्यादा स्कूलों ने इस अभियान में हिस्सा लिया है। ऐसा दावा द मुंबई स्कूल प्रिंसिपल्स असोसिएशन' ने किया है। असोसिएशन का कहना है कि छात्रों के बीच देशभक्ति की भावना को बढ़ाने और जागरूकता फैलाने के लिए यह कदम उठाया जा रहा है। इसके साथ ही इन दिनों सोशल मीडिया पर भी मेड इन चायना का बहिष्कार करने वाले पोस्ट व वीडियो खूब वायरल हो रहे हैं।
सैनिकों के प्रति सम्मान 
मुंबई स्कूल प्रिंसिपल्स असोसिएशन के सदस्यों का कहना है कि सीमा पर अपनी जान की बाजी लगाकर देश और हमारी रक्षा करने वाले सैनिकों के प्रति हमारा छोटा सा प्रयास है। असोसिएशन के सदस्य प्रशांत रेडिज ने कहा कि देश में इस समय गंभीर हालात हैं। यह बात छात्रों को समझाने के लिए और उन्हें इससे अवगत कराने के लिए हम प्रयास कर रहे हैं। देश का पैसा देश में ही रहे, दुश्मन इसका फायदा न उठाएं, इसलिए चीन में बने पेन, कंपास बॉक्स और इरेजर आदि चीजें का बहिष्कार करें।
चाइना सामानों से पटा बाजार
बाजार मेड इन चाइना सामानों से पटा पड़ा है, सस्ती होने के कारण लोग इसे खरीदने में ज्यादा रुचि रखते हैं। व्यापार के माध्यम से चीन आर्थिक रूप से मजबूत हो रहा है। चीन अपनी सेना और हथियार बढ़ाने पर इसका बड़ा भाग खर्च करता है। चीनी सामानों के बहिष्कार से वह कमजोर होगा। इसके साथ ही भारतीय सेना को इससे और बल मिलेगा।

जल्द निकालेंगे सर्कुलर   

मुंबई स्कूल प्रिंसिपल्स असोसिएशन जल्द सर्कुलर जारी करने वाला है। इसे सभी स्कूलों को भेजा जाएगा। रेडिज ने बताया कि स्कूलों की जिम्मेदारी है कि वह छात्रों में देशभक्ति की भावना जगाएं। वहीं प्रधानाध्यपकों का कहना है कि अगर यह अपील शिक्षा विभाग की तरफ से की जाती तो दूसरे स्कूल भी इसका पालन करते।

जापान में अमेरिकी सामानों का विरोध 

आर्चडायसेंस बोर्ड आॅफ एजुकेशन्स के सहसचिव फादर फ्रांसिस स्वामी ने कहा है कि जापान अपने स्कूलों में छात्रों को अमेरिकी वस्तुएं का इस्तेमाल न करने की शिक्षा देता है। एबीई के मुंबई में 150 से अधिक स्कूल हंै। प्रिंसिपलों का कहना है कि छात्रों को इस विषय की जानकारी देनी चाहिए। चीन में बने सामानों के बहिष्कार के साथ विद्यार्थियों को ताजा घटनाक्रम पर जागरूक करना चाहिए। 

Wednesday, June 28, 2017

फिजेट स्पिनर के चक्रव्यूह में फंसे मुंबई के युवा

मुंबई। इन दिनों फिजेट स्पिनर नामक खिलौने ने मुंबई के युवाओं को एक अलग लत लगा दी है।  उंगली के बीच में फंसानेवाले एक छोटे से बैरिंग का क्रेज मुंबईकरों में बढ़ता जा रहा है। कुछ
जानकारो का मानना है कि यह एकाग्रता और टेन्शन के चक्रव्यूह से मुक्ति पाने का एक नया तरीका है। वहीं स्पिनर को उंगलियों में फंसाकर घुमाने से एडीएचडी- आॅप्टिजम (ध्यान अभाव सक्रीयता विकार) जैसी बीमारियों से बचा जा सकता है। इस प्रकार का दावा इसे बनाने वाली कंपनियां कर रही हंै। आजकल स्कूल, कॉलेज, कैफे और ट्रेनों में युवाओं के हाथों में दिखना आम हो गया है। इसके जाल में बच्चों से लेकर युवा तक फंसते जा रहे हंै। वहीं इस खिलौने की उपयोगिता को लेकर विशेषज्ञ एकमत नहीं हैं।  

कम समय में हुआ लोकप्रिय
मुंबई के मार्केट में फरवरी से फिजेट स्पिनर बिकना शुरू हुआ। कुछ महीने में ही यह खिलौना काफी लोकप्रिय हो गया। माना जा रहा है कि जिन लोगों की एकाग्रता में दिक्कत होती है या जो लोग बेचैनी की वजह से कोई हरकत करते हैं, उन्हें इससे मदद मिलती है। भले ही विशेषज्ञ इसकी उपयोगिता को प्रूफ नहीं कर पा रहे हों, लेकिन इसकी लोकप्रियता लोगों में बढ़ती जा रही है।

क्या है फिजिट स्पिनर 
इस खिलौने के सेंटर में एक बैरिंग लगा होता है और इसकी मदद से इसे घुमाया जाता है।  फिजेट स्पिनर स्टील, सोने, प्लैटिनम, लोहा, प्लास्टिक और टाइटेनियम जैसे धातु से बनाया जाता है। इस खिलौने के कुल 63 विभन्न प्रकार हंै। बैरिंग के साथ इसमें 4, 3 और 2 गियर में उपलब्ध है। इसकी कीमत बाजारों में 20 से लेकर 150 रुपए तक है।

अमेरिकी स्कूलों में बैन 
फिजेट स्पिनर भारत में आने के पहले अमेरिका में अपनी खास लोकप्रियता हासिल की थी।  इसकी अमेरिकन बच्चों को इस कदर आदत लग गई थी कि वहां के कई स्कूलों ने इस खिलौने पर बैन लगा दी। खबर के अनुसार, बच्चों पर इसका गलत असर पड़ने से अमेरिका के स्कूलों ने इसे बैन लगा दिया था।  

मोबाइल पर भी छाया
एप्पल के ऐप स्टोर पर एक ऐप काफी हिट हो गया है, जिसका नाम फिजेट स्पिनर है। फ्री ऐप की  कैटेगरी के सभी चर्चित ऐप को पीछे छोड़ते हुए यह ऐप नंबर 1 की श्रेणी में आ गया है। दरअसल यह  ऐप फिजिट पर आधारित है। अमेरिका और यूरोपीय देशों में लोग असल जिंदगी के साथ स्मार्टफोन पर भी इसका लुत्फ उठाते दिख रहे हंै।   

1990 में हुआ था आविष्कार 
फिजेट का आविष्कार 1990 में हुआ था, लेकिन यह 2017 में प्रसिद्ध हुआ। बच्चों से लेकर बड़े  तक फिजेट को खरीद रहे हैं और भरपूर आनंद उठा रहे हैं। फिजेट स्पिनर नामक ऐप भी इसी  खिलौने के आधार पर बनाया गया है। इस ऐप में दिखने वाले फिजिट को स्वाइप करके देर तक घुमाना  होता है। लक्ष्य पूरा होने पर एक फिजेट्स अनलॉक होता है। कैटचप्प गेम्स नाम की  कंपनी ने इस ऐप को बनाया है। 

चायनीज खिलौनों की धूम
नए-नए बनावट के चीनी खिलौने छोटे बच्चों से लेकर युवाओं तक काफी आकर्षित करते हंै। अब चायनीज  फिजेट स्पिनर भी मुंबई के बाजारों में काफी धूम मचा रखी है। बच्चों और युवाओं की डिमांड देखते  हुए अलग-अलग प्रकार के फिजेट स्पिनर बाजार में उपलब्ध हैं।  यह खिलौना चीन में 25 से 30  वर्ष पहले आया था।
नितिन बिनेकर 

Friday, June 9, 2017

मुंबई के फुटपाथ पर विश्वजीत की विश्वकला

मुंबई। दुनिया की भींड में तमान ऐसे हुनरबाज लोग है जिनकां हुनर देख लोग दांतों तले ऊगली दबा लेते है. ऐसे ही हुनरबाज मुंबई के ओवल ग्राउंड के फुटपाथ पर अपने कला से आने जानेवाले आम जनताको को आकर्षित कर रहा है. कोलकाता के रहने वाले यह अदभुत कलाकार विश्वजीत दास ने अपने कला से एक अलग मुकाम हासिल किया है,विश्वजीत कोलकात में एक गैराज में काम करने वाले मजदुर है। अब सपनो की नगरी कहनेवाली मुंबई में अपना नसीब अजामे आए है। विश्वजीत अपने अदभुत कला के माध्यम से अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा लिया है। विश्वजीत दास ने दबंग दुनिया को बताया कि माइक्रो मिनेएचर का काम शोकिन तोर पर किया था, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने फिश रिस्कल्स और चावल के दानों पर अदभुत कलाकृतिया बनाकर लोगों को हैरानी में डाल दिया है. 

दांडी यात्रा और ताजमहल जैसे बनाई कलाकृतियां 

विश्वजीत दास ने मछली के स्केल्स और कांटो से उसने एक से बढ़कर एक कलाकृतियां बनाकर लोगों का ध्यान आकर्षित किया है, कलाकार विश्वजीत ने मछली के स्केल्स तराश कर चावल के दाने पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की दांडी यात्रा और ताजमहल जैसे कलाकृतिया बनाई है इसके साथ ही माँ दुर्गा, मोर, हाथी, रिक्शा पर सवार बनाकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा दिया है,

कई बार विश्वजीत के कला का हुआ सन्मान  
विश्वजीत दास को उनके अनोखी कलाकृतियों के लिए बंगाल राज्य सरकार की और से कई बार सम्मानित किया जा चुका है. इसके साथ ही आसाम के राज्यपाल ने उनकी इन खुबसुरत कला के लिए सम्मान किया. विश्वजीत कहना है, कि वे मिनेयचर की दुनिया में दूसरों से अलग और यूनिक चीज करने में विश्वास रखते है. 

जल्द बना लेगें वर्ल्ड रिकोर्ड  
विश्वजीत ने बताया की वे अब एक चावल के दाने पर दुनिया के सातों अजूबों को बनाकर गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकोर्ड में अपना नाम दर्ज कराने में लगे. उन्होंने बताया कि अब तक वे चावल के दानें पर ताजमहल बालों पर राष्ट्रपति भवन, चावल के दाने पर ही गांधी जी की दांडी यात्रा बना चुके है, 

                                          छत्रपति शिवाजी महाराज की बनाएंगे कलाकृति 
विश्वजीत दास और उन्हके भाई ने दबंग दुनिया को बताया की  मुंबई में वह जल्द ही छत्रपति शिवाजी महाराज की कलाकृति बनाने जा रहे है।  जो कि मेरे महाराष्ट्र दौरे की यह याद रहेगी, और महाराष्ट्र पर आने पर कई लोगों ने मुझे छत्रपति शिवाजी महाराज की कलाकृति बनाने का सुझाव भी दिया है।  जो में जल्द ही पूरा करने जा रहा हु।   

 अपने कला से कैंसर पीड़ित की करेंगे मदत 
विश्वजीत दास पहले से ही गरीबी में जीवन उन्होंने बिताया है, आज भी उन्हके सर पर छत नहीं, लेकिन अपने लगन से विश्वजीत और अपने भाइयो के साथ मुंबई के ओवल ग्राउंड पर अपनी कलाकृतिया बना रहे है। विश्वजीत ने बताया कि उन्हका जो हुनर है, वह मानवता के काम आना चाहिए जिसके लिए वह अपने कलाकृतियों के माध्यम से कैंसर पीड़ितों की मदत करने का संकल्प लिया है.  

कैसे बनाते है कलाकृती 
मछली के स्केल्स से बनाई गई कलाकृति काफी सालों साल रखा जा सकता है, विश्वजीत ने बताया की पहले मछली खरीदकर उसकी स्केल निकल लेते है, उसके बाद उसे केमिकल में डालकर ट्रीटमेंट करते है फिर आकृति के हिसाब से स्केल की कटिंग कर सुई के सामान औजारों से इसे आकृति दी जाती है स्केल्स  ट्रीटमेंट से इसकी उम्र बढ़ जाती है, जिससे किसी भी वातावरण का इन पर खराब असर नहीं पड़ता है  
नितिन बिनेकर 
मो.९९७०४२०७३६ 

Tuesday, June 6, 2017

शारीरिक बीमारीपर मात कर अनुष्का ने १२ वी में हासिल किए ७४ प्रतिशत अंक

मुंबई। बचपन से ही बिमारी से लड़ रही अनुष्काने कक्षा १२ वी में ७४  प्रतिशत गुण हासिल कर समाज के सामने एक मिसाल कायम की है। अनुष्का के इस कारनामे से रिश्तेदार, पड़ोसियों और गांव के लोगों ने उसकी महिनत की काफी तारीफ कर उसका सन्मान किया । आप को बात दे कि, अनुष्का जब तीन साल की थी तब से वह बीमार रहती थी। उसके पाओं में मोड़ गिर गई थी  लेकिन सभी तरीके का इलाज करने पर भी उसे अपाहिज होने से बचाया नहीं जा सका । पर अनुष्का ने  हिमत न हारते वह लगन से पढ़ाई करने लगी और आज १२ वी की कक्षा में  ७४ प्रतिशत गुन हासिल कर अपने विकलांगता पर मात की है।  
 ग़रीबी में पली बड़ी अनुष्का
अनुष्का विरार पश्चिम वटार के पास रहती है, वह माँ-बाप की एकलवती बेटी है। उसके पिता कपडे सिलाई का काम करते है। अपने बच्ची को बाकि बच्चों जैसे जीवन जीने के लिए हर स्वभव प्रयास अनुष्का के पिताने किए । बड़े अस्पतालों के चक्कर भी मारे लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। लेकिन अनुष्का के माता पिता ने हार नहीं मानी।  अनुष्का के शिक्षा पर अपना ध्यान दिया। 
ग़रीबी में पली अनुष्का ने हार नहीं मानी 
अनुष्का के पिता उत्तम नाईक एक टेलर है। उन्हके घर की आर्थिक परिस्थिति भी काफी कमजोर है, ऐसे में अनुष्का के बिमारी पर भी काफी पैसे लगे थे, लेकिन उसके पिताने रात दिन एक कर अपने बच्ची के बिमारी को ठीक करने के लिए , काफी प्रयास किए, इतना ही नहीं तो हर रोज अनुष्का को अपने गोदी में उठाकर स्कुल ले जाते थे। उन्हके पिता की महीन से आज अनुष्का ने यह सफलता हासिल की बात दबंग दुनिया को बताई है।    
अनुष्का के हुए कई ऑपरेशन
स्कूली पढ़ाई के दौरान अनुष्का के कई ऑपरेशन हुए थे। जब वह नौ वी की कक्षा में थी तब उसके गर्दन की नस दब गई थी. जिसके वजह से गर्दन का ऑपरेशन करना पड़ा था, जिसके वजह से २ महीनो तक अनुष्का स्कुल नहीं जा सकी। जिससे का परिणाम उसने अपने पढ़ाई पर कभी भी नहीं गिरने दिया। जिसके बाद उसने १० वी कक्षा में भी  ७७ प्रतिशत गुन प्राप्त किए थे।  
बहुत पढ़ लिख कर माँ बाप की करनी है सेवा 
१२ वी की कक्षा में ७४ प्रतिशत गुन प्राप्त करके अपने माँता- पिता के महीन की चीज़ की,  अनुष्का ने अपने सफलता का श्रेय अपने माँता-पिता और शिक्षकों को दिया है ,अनुष्का ने दबंग दुनिया को बताया कि,मैंने जो सफलता हासिल की है. जिसके पिछचे कई लोगों की महीनत है , मुझे  हर समय प्रोत्साहित करनेवाले मेरे दोस्त और मेरे  माँता पिता रहे है। ,अनुष्का  ने बताया की अपने माँता- पिताने मेरे लिए जो कष्ट लिए है जिसकों में अपने शब्द में व्यक्त नहीं कर सकती, मेरा सपना है की बहुत पढ़ लिख कर और आगे जाकर माता पिता की  सेवा करू। 

Wednesday, September 14, 2016

गरीबी महापाप............

 
आज में अपने देश की, ग़रीब लोगों की परिस्थित को देखता  हूं तो बहुत हताश हो जाता हू। क्या पत्ता लोगो की इनसानीयत क्या मरगी ? क़्या लोग अपने स्वार्थ के चक्कर में अपने अंदर की इंसानियत को खत्म कर दिया है क्या गाव के और शहरों के लोगो की ग़रीबी मिट चुकी है क्या लोगों को दो वक्त का खाना चाहिये औ शिक्षा मिल रही है क्या विकलांगों की तकलीफे खत्म हो गयी क्या किसानों  की आत्म हत्या थम गयी है आज  देश को आझाद हुवे कुल 70  साल पूरे हुवे है।  पर आज भी देश मे इन समस्याओं का निराकरन नही हुआ है। तब भी देश मे ऐसी ही परिस्थिति थी और आज  भी वैसे की वैसी ही है। 

देश की सरकार डिजीटल इंडिया ओर स्मार्ट सीटी के झुटें सपने भोली जनता को दिखारही है। जो कीवास्तविक परिस्थिती से कुछ और ही है दोस्तो मेरी  इस पर लिखने की कोई मानसिकता नहीं थी। पर मैंने अपने देश में रोतेबिलगते जर्जर हालात मे जी रहे उन भिखारी ओर अपाहिज लोगों के बच्चो को उन  स्मार्ट सीटी मे  देखा है। गरीब लोगो की हालात देख कर ऐसा लगता है कीआज स्मार्ट सीटी और डिजिटल इंडिया का अभियान कूछ काम का ही नही है। दोस्तों गरिब और मंजदुर लोगो को दो वक्त की रोटी रहने को मकान और अच्छी शिक्षा मिल जाय इतना ही काफी है।
                                     
सरकार की डिजिट इंडिया की  निति सब झुट है जिसकी सच्चाई आप अपने जीतीजागती जींदगी मे खुद देख रहे है। हाल ही में ओडिसा में एक आदमी के पास पैसे नहीं होने की वजह से अपनी मृत पत्नी का शव अपने कंधो पर उठाकर १२ किलो मीटर ले जा ना पड़ा है । तो वही इंदौर के रतनगढ़ के गाव में ही पत्नी के अंतिम संस्कार के लिए लकड़िया खरीदने को पति के पास पैसे नहीं होने की वजह से  समशान में उसे लकड़िया नहीं दी गई। मजबूरन इस गरीब को अपने पत्नी का अंतिम संस्कार कचरा जलाकर करना पड़ा है। यह खबर आप लोगो ने टीवी न्यूज चैनलो में अखबारों में देखी और पढ़ी ही होगी। जिससे पता चलता है की गरीब लोगो आज कैसे जी रहे है। यह दोनों घटना भारत की गरिबी मे जी रहे लोगो की सच्चाई पेश करती है। 
 आज देश को आझाद होने को कुल 70  साल जरूर पुरे  हुवे है। पर आज भी देश मे भुकमरीबेरोजगारी, जैसे अनगिनत समस्या से जनता को सामना करना पड़ रहा है। देश के युवाओ को रोजगार नहीं है। देशने शिक्षा क्षेत्र में जरूर क्रांती की है। पर ओ भी पुंजिपतियो के हित के लिये जिसका कोई फायदा ही नही. क्युकी आप को पता ही होगा की  एक इंजीनियर को निजी कॉलेज में कितनी  तनखा मिलती है जितनी बच्चे को स्टडी मटेरीयल होता हे ना बस उतनी।
आज भी देश मे लोगों की मुलभूत सुविधा के अभाव मे देशवासी जी रहे है। कपडा-रोटी ओर मकान यह भारत के हर नागरिकों का प्राथमिक अधिकार है। पर आज लोगो को दो वक्त की रोटी-छोड दो साहब पहनें के लिए कपड़ा ओर रहने के लिए ठींकठाक मकान भी नसीब नही हो रहा है। जिसके चलते हर भारतीय अपने जरुरोतों के लिए जो काम मिला वहकर रहे है। यह बात अशिक्षित लोग़ ही नही तो शिक्षीत बेरोजगार युवा भी करते नजर आ रहे है। आज आप देख सकते हो की, सरकारी नौकरी में कैसी मारा-मारी शुरू है। आजकी युवा पिढी का ज्यादा रुची सरकारी नौकरी पर ही होती है। इस की वजह आप को पताही है दोस्तों वास्तवीक्ता देखी जाय तो आज के युवाओ को ऐसी नौकरी नही करना चाहते पर बेरोजारी डर से और निजी कंपनी की पैसा बचाव लॉबी से तंगआकर लोग़ सरकारी नौकरी करना चाहते है। साथ ही हर व्यक्ति सुरक्षित झोन में रहना आज की परिस्थिती से उचित मानते है।
     आज हर स्मार्ट सीटी के तर्ज पर भाजप सरकार ने स्मार्ट सीटी का बिगुल फ़ूक दिया है और स्मार्ट सी टी के शहरों की सूची भी जाहिर की है। पर सरकार को यह नही दिखता की अपने स्मार्ट सीटी मे भी भिखारियो की संख्या कितनी बढी है।  नाही कोई इसविषय पर चर्चा करना चाहता है। नाही कोई इस पर बहस करता हे  क्युकी सब को पत्ता होता हे की " भिखारी नाही इस राज्यका होता हे" "ना उस राज्य का होता है" नाही उसका कोई युनियन होता है जिसके चलते राजनेतिक पार्टियों को उन लोगों का कोई फायदा नही होता. जिससे उनकी चिखे सुनने वालाभी कोई नही है ओर जो होता हे  तो सिर्फ रेलवे स्टेशन या गलीचौहारे पर बैठे भिकारियों को रुपये  या होगी उतनी भिक्षादेकर निकल जाता है  पर कोई ऐ नही सोचता की भारत को भिकारी मुक्त और बेरोजागारी मुक्त करना चाहिये
          
दोस्तो में आप को बता देता हू की कुछ ऐसी संस्था है। जो अपना समाज के प्रति दायित्व समझकर मंदत करने के लिए आगें आरही है। जिसमे नागपुर की उपाय संस्था फूट पाथ पार रहने वाले गरिब मजदुर पेशा लोगो के बच्चो  को पढा रही है। इस संस्था में जुड़े युवक और युवतियां हॉयर एजूकेशन के है। साथी ही  ऐसी अनगिनत संस्था है जो की अपना कोई स्वार्थ के बिना कार्य कर रही है। दोस्तो कभी आप ने रेलवे स्टेशन पर "अपाहिज लोगो को गाना गा कर अपनी भूक मिटाने के लिये लोगो की मदंत मांगते देखा होगा" तो कोई विकलांग और बुर्जुग लोगो कुछ चिजे बेचकर अपना गुजारा चलाते हुवे भी देखा होगा। और आप में से कोई लोगो उन्हें  मंदत भी की होगी। पर अभी मंदत नहीं तो इसकी जड़ खोजने का वक्त आ गया है। आज इन्ह  भिकारी और विकलांग लोगो  ज्यादा तादात स्मार्ट सिटी और मेट्रो सीटी मे ही है। दोस्तो आज अपन फिल्मी गानों के कार्यक्रम मे बेफसुल पैसा उडाते है पर कोई अंधा व्यक्ति गाना गाकर अपनी रोजी रोटी कमाता होगा तो उसे क्या देते हो ?
    हर नयी सरकार भारत मे बेरोजगारी,  किसान आत्म हत्या, भुकमरी  और गरिब जैसे मुद्दे को लेकर चुनकर आती है। पर जिसके बाद नाही यह समस्या का निराकर तो नहीं होतो भाईसाहब बल्कि उसमे व्रुद्धि जरूर होती है। देश मे हर राजनैतिक पार्टिया विकास की झूटी बाते जरूर करती है और जब चुन कर आने के बाद पूंजीपतियों का विकास और खुदका विकास पर ज्यादा ध्यान देता है। इस वास्तविक परिस्थिति पर जितना लिखेगे उतना कम ही है । क्यूकी देश में  पढ़े लिखे लोगो होते तो आज इस विषय पर जरूर बहस  होती ओर सरकार उत्तर देना होता।  साधार व्यक्ति आज अपनी समस्या से इतना घिरा पढ़ा हुआ है  की, उसकी इस विषय  पर आज बात करने की मनस्थिति नहीं रही  है। क्युकी उसकी वर्तमान की जिंदगी में काफी  समस्या रहती है। खेर आज मिडिया वालो को भी पैसो की स्टोरी होनी होती है। जिससे कंपनी को फायदा हो सके लेकिन हमारे  भिकारी, विकलांग भाईयों की और से कुछ नही मिलता जिससे यह विषय उन्हके लिये मामुली हो चुका है। जिससे पता चलता हे की आज गरिबी होना कितना  महापाप हो गया है...............
नितिन बिनेकर
मो. ९९७०४२०७३६  
( दोस्तों मैंने अपने विचार इस ग़रीबी महापाप इस  ब्लॉगर  पर अपने शंब्दों में रखे है।  इस विषय से किसी की  भावनाओं को ठेच पोह्ची होगी तो मुझे शमा करे / हां...... इस में कुछ गलतिया भी होगीतो  )